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डिस्टिलरी प्रदूषण मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 30 दिन में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश

May 20, 2026 Source: Veridhar

डिस्टिलरी प्रदूषण मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 30 दिन में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण और जल स्रोतों के दूषित होने के मामलों को लेकर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्वतः संज्ञान से दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए बड़ा आदेश जारी किया। कोर्ट ने राज्य की तीन प्रमुख शराब डिस्टिलरी इकाइयों के स्वतंत्र निरीक्षण के लिए दो अधिवक्ताओं को ‘कोर्ट कमिश्नर’ नियुक्त किया है। हाईकोर्ट ने अधिवक्ता वैभव शुक्ला और अपूर्वा त्रिपाठी को भाटिया वाइन मर्चेंट्स प्राइवेट लिमिटेड, वेलकम डिस्टिलरीज प्राइवेट लिमिटेड और छत्तीसगढ़ डिस्टिलरीज प्राइवेट लिमिटेड का निरीक्षण करने की जिम्मेदारी सौंपी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पर्यावरणीय मानकों के पालन और सुरक्षा उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं, इसलिए स्वतंत्र जांच आवश्यक है। सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण बोर्ड ने अदालत को बताया कि भाटिया वाइन मर्चेंट्स और छत्तीसगढ़ डिस्टिलरीज में किए गए निरीक्षणों में परिसर के बाहर अनुपचारित अपशिष्ट जल का निर्वहन नहीं मिला। बोर्ड के अनुसार इन इकाइयों की निगरानी प्रणाली के मापदंड निर्धारित सीमा के भीतर पाए गए। हालांकि, वेलकम डिस्टिलरीज प्राइवेट लिमिटेड को लेकर बोर्ड ने कई गंभीर उल्लंघनों की जानकारी दी। रिपोर्ट में निष्क्रिय अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र, दूषित जल का निर्वहन, क्षतिग्रस्त लैगून, तय सीमा से अधिक उत्सर्जन और ऑनलाइन निगरानी डेटा में गड़बड़ी जैसी कमियां सामने आईं। इन अनियमितताओं के चलते नवंबर 2025 में कंपनी पर 54.60 लाख रुपये का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया गया था और बंद करने के निर्देश भी जारी किए गए थे। कोर्ट ने शपथपत्रों और दस्तावेजों की समीक्षा के बाद कहा कि केवल सरकारी रिपोर्टों के आधार पर संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता। इसलिए निष्पक्ष और स्वतंत्र तथ्यात्मक सत्यापन जरूरी है। डिवीजन बेंच ने कोर्ट कमिश्नरों को पर्यावरण बोर्ड के अधिकारियों के साथ संबंधित इकाइयों का निरीक्षण करने, दावों की जांच करने और 30 दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट के इस फैसले को प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण और औद्योगिक इकाइयों की जवाबदेही तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।