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‘स्वेच्छा से सेक्स वर्क करने वाली महिला को कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए’ – सुप्रीम कोर्ट ...
June 1, 2026 Source: Veridhar
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई बालिग महिला अपनी इच्छा से आजीविका कमाने के लिए सेक्स वर्क करती है, तो उसे अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में महिलाओं को गिरफ्तार करना, हिरासत में रखना या उन्हें प्रताड़ित करना कानून के उद्देश्य के अनुरूप नहीं है।
न्यायालय ने लगभग 70 वर्ष पुराने अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (ITPA) का विस्तृत विश्लेषण करते हुए कहा कि इस कानून का मकसद वेश्यावृत्ति को पूरी तरह समाप्त करना या सेक्स वर्क को अपराध घोषित करना नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य मानव तस्करी, जबरन देह व्यापार और वेश्यावृत्ति के व्यावसायीकरण पर रोक लगाना है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से सेक्स वर्क करता है, तो केवल इस आधार पर उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती। हालांकि, वेश्यालय चलाना, किसी स्थान को देह व्यापार के लिए उपलब्ध कराना, किसी की कमाई पर निर्भर रहना या किसी को धोखे, दबाव अथवा बलपूर्वक देह व्यापार में धकेलना कानूनन अपराध है।
अदालत ने ITPA की विभिन्न धाराओं का उल्लेख करते हुए बताया कि धारा 3 के तहत वेश्यालय चलाने या उसके लिए स्थान उपलब्ध कराने पर सजा का प्रावधान है। धारा 4 सेक्स वर्कर की आय पर निर्भर रहने वालों को दंडित करती है, जबकि धारा 5 किसी व्यक्ति को जबरन या बहला-फुसलाकर देह व्यापार में शामिल करने को अपराध मानती है। वहीं धारा 7 सार्वजनिक स्थानों तथा धार्मिक स्थलों के 200 मीटर के दायरे में सेक्स वर्क को प्रतिबंधित करती है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें कहा गया था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक नागरिक को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार प्राप्त है। यह अधिकार सेक्स वर्करों पर भी समान रूप से लागू होता है। अदालत ने माना कि कई बार पुलिस का व्यवहार सेक्स वर्करों के प्रति अनुचित रहा है, जिससे उनकी गरिमा को ठेस पहुंचती है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से सेक्स वर्क कर रहा है और कानून की अन्य धाराओं का उल्लंघन नहीं कर रहा है, तो उसे हिरासत में लेने, सुधार गृह भेजने या अनावश्यक रूप से परेशान करने का कोई औचित्य नहीं है। यह फैसला सेक्स वर्करों के अधिकारों और सम्मानजनक जीवन के अधिकार को मजबूत करने वाला माना जा रहा है।